नई दिल्ली। यूक्रेन युद्ध के बाद रूसी तेल पर लगाए गए पश्चिमी प्रतिबंधों को कई वर्ष बीत चुके हैं। इसके बावजूद जहाजों, स्वामित्व रिकॉर्ड और बीमा दस्तावेजों की जांच से पता चलता है कि रूस से जुड़ा एक विशाल समुद्री नेटवर्क अब भी तेल परिवहन में सक्रिय है। इसे आम तौर पर “शैडो फ्लीट” कहा जाता है।

क्या है शैडो फ्लीट?

इस नेटवर्क में ऐसे पुराने तेल टैंकर शामिल होते हैं जिनका स्वामित्व बार-बार बदलता है और जिनका संचालन जटिल कंपनियों के माध्यम से किया जाता है। कई जहाज अपनी पहचान, ध्वज, बीमा या प्रबंधन कंपनी बदलते रहते हैं, जिससे उनकी गतिविधियों का पता लगाना कठिन हो जाता है।

निगरानी से बचने के तरीके

कुछ जहाज Automatic Identification System यानी AIS को सीमित समय के लिए बंद कर देते हैं या समुद्र में जहाज से जहाज तेल स्थानांतरण करते हैं। दस्तावेजों और वास्तविक गतिविधि के बीच अंतर होने पर यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि तेल कहां से आया और अंतिम खरीदार कौन है।

प्रतिबंधों के बावजूद बढ़ता कारोबार

यूरोपीय प्रतिबंधों और मूल्य सीमा के बाद भी विभिन्न बाजारों में रूसी तेल की मांग बनी हुई है। व्यापारिक कंपनियां, रिफाइनरियां और बिचौलिए अलग-अलग मार्गों तथा भुगतान व्यवस्थाओं का इस्तेमाल करते हैं। इसी कारण कागज पर कड़े दिखने वाले प्रतिबंधों को लागू करना व्यवहार में चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

सुरक्षा और पर्यावरण की चिंता

पुराने टैंकरों, अस्पष्ट बीमा और कमजोर निगरानी से समुद्री दुर्घटना तथा तेल रिसाव का जोखिम बढ़ सकता है। दुर्घटना होने पर जिम्मेदारी तय करना और नुकसान की भरपाई कराना भी कठिन हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रभावी निगरानी के लिए देशों के बीच जहाज पंजीकरण, बीमा, स्वामित्व और बंदरगाह गतिविधियों से जुड़ी जानकारी साझा करना जरूरी है। शैडो फ्लीट केवल प्रतिबंधों का मामला नहीं, बल्कि समुद्री सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण की भी बड़ी चुनौती है।