भोपाल। गलियों से लेकर आंगनों तक गूंजते सावन के सुमधुर लोकगीत, हाथों में रची गहरी सतरंगी मेहंदी और सोलह श्रृंगार में सजीं महिलाएं इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि हमारी सनातन संस्कृति आज भी कितनी समृद्ध और ऊर्जावान है। गहराई में उतरें तो तीज पति-पत्नी के अटूट प्रेम, प्रकृति से जुड़ाव और शरीर को निरोगी बनाने वाले एक शानदार वैज्ञानिक फॉर्मूले का महापर्व है।

सनातन महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने जीवनसाथी के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या और निर्जला व्रत किया था। उनके अटल संकल्प से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने आज ही के दिन उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था।

विज्ञान की कसौटी पर तीज

करीब 12 से 16 घंटे के उपवास के बाद शरीर 'ऑटोफैगी' मोड में चला जाता है, जिसमें शरीर अपनी पुरानी, खराब कोशिकाओं को नष्ट करके नई और स्वस्थ कोशिकाओं का निर्माण करता है — इसी खोज के लिए वैज्ञानिकों को नोबेल पुरस्कार भी मिल चुका है। सही उपवास इंसुलिन सेंसिटिविटी बेहतर बनाता है और सूजन कम करता है। मेहंदी की ठंडी तासीर शरीर का तापमान संतुलित रखती है, जबकि सामूहिक उत्सव 'हैप्पी हार्मोन्स' के स्त्राव को बढ़ाता है।

यह त्योहार इस बात का सबसे सुंदर उदाहरण है कि कैसे हमारी सनातन आस्था और आधुनिक विज्ञान एक ही दिशा में कदम मिलाकर चलते हैं।