इंदौर। आज 14 सितंबर को पूरा देश हिंदी दिवस मना रहा है। 'देश दर्पण संवाद' के प्रथम संस्करण के शुभारंभ के लिए इससे अधिक गौरवमयी अवसर और क्या हो सकता है। आज हम जिस हिंदी को आसानी से लिखते और बोलते हैं, उसकी शुरुआत मुख्य रूप से वर्ष 1900 में हुई थी। इसी वर्ष किशोरीलाल गोस्वामी ने 'इंदुमती' नामक कहानी लिखी थी, जो पूरी तरह से हिंदी खड़ी बोली और गद्य अंदाज में रची गई पहली रचना थी।

हिंदी का यह सफर इतना आसान नहीं रहा। 1904 ईस्वी में उत्तर भारत के हर स्कूल में इस भाषा को पढ़ाए जाने की मांग उठी। इसके जवाब में 1905 ईस्वी में अंग्रेज सरकार ने हिंदी खड़ी बोली गद्य के खिलाफ एक सूचना निकाली। लेकिन भाषा का विकास रुका नहीं। 1909 में 'पुष्पवाटिका' और 1913 व 1915 में इतिहास, अर्थशास्त्र और भूगोल की किताबों के अनुवाद और लेखन ने खड़ी बोली को स्थापित किया। अंततः 14 सितंबर 1949 को हिंदी को संविधान सभा में आजाद भारत की राजभाषा का दर्जा दे दिया गया।

आज हिंदी का डंका पूरी दुनिया में बज रहा है। 2011 के एक सर्वे के दावे के अनुसार, दुनिया की 18% आबादी हिंदी समझती है, जो कि चीनी भाषा मैंडरिन (15.27%) और अंग्रेजी (13.85%) को समझने वालों से भी अधिक है।

काशी और बीएचयू का ऐतिहासिक योगदान

जब भी हिंदी की समृद्ध परंपरा की चर्चा होती है, तो काशी का नाम प्रमुखता से आता है। यह वही धरती है जहां भारतेंदु हरिश्चंद्र ने आधुनिक साहित्यिक हिंदी की नींव मजबूत की। काशी के प्रमुख आधुनिक हिंदी के जन्मदाताओं में भारतेंदु हरिश्चंद्र के साथ-साथ मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी और नामवर सिंह जैसे युगप्रवर्तक शामिल हैं।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय का योगदान सबसे महत्वपूर्ण रहा है। महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के प्रयासों से ही वर्ष 1900 में कचहरियों में देवनागरी लिपि को स्वीकार्यता मिली थी। वर्ष 1919 में आचार्य रामचंद्र शुक्ल को यहां हिंदी का प्रोफेसर बनाया गया, और 1920 में बीएचयू में हिंदी की पोस्ट ग्रेजुएशन (PG) की पढ़ाई शुरू हुई।